नए राजनीतिक युग का पदार्पण

1971 के बाद से देश में पहली बार किसी एक राजनैतिक दल को इतना भारी बहुमत मिला है।इसने एक नए राजनीतिक युग के द्वार खोल दिए हैं। सभी राजनैतिक खिलाड़ियों को इसके संकेतों को समझने का प्रयत्न करना चाहिए, अन्यथा वे अपनी ही कश्तियों में डूब जाएंगे।

“मोदी सुनामी“ का सबसे बड़ा प्रभाव वंशवादी राजनीति के खात्मे के रूप में दिखाई देता है। वर्षों से इस बात को स्वीकार सा कर लिया गया था कि हाई प्रोफाइल राजनीतिज्ञों की संततियां, उनकी गद्दी संभालेंगी। मोदी की दूसरी बड़ी जीत ने इस भ्रम को तोड़ दिया है।

दूसरे, इन चुनावों ने जाति की राजनीति को निरर्थक साबित कर दिया है। अभी तक बहुत से दल जाति या समुदाय के आधार पर गठबंधन किए हुए थे। उत्तरदेश में समाजवादी-बहुजन समाजवादी दल ने इस आधार पर गठबंधन किया था कि यादव, जाटव, दलित और मुसलमानों के वोट इस गठबंधन को मिल सकेंगे। नए परिप्रेक्ष्य में उनका गणित फेल हो चुका है, और यह सिद्ध हो चुका है कि राजनैतिक रसायनों से जाति के गणित का हल नहीं निकाला जा सकता।

तीसरे, नए राजनीतिक युग ने नेतृत्व मूल्यांकन की एक नई प्रक्रिया का उद्घाटन किया है। मतदाता वंशवादी निष्ठा से ऊपर उठकर सक्रिय रूप से सोचने लगा है कि उनके देश के लिए कैसा नेतृत्व सर्वश्रेष्ठ हो सकता है।

चौथे, इन चुनाव परिणामों ने यह सिद्ध कर दिया है कि देश की जनता एक विश्वसनीय दल का शासन चाहती है। भाजपा ने विकास, आर्थिक जगत, जन कल्याण से जुड़ी आवास, स्वच्छता, बिजली, गैस आदि योजनाओं का ठोस परिणाम लोगों के सामने रखा है।

भाजपा ने तुष्टीकरण की राजनीति से अपने को दूर रखा, और इस बारे में अपनी नीतियों को भी स्पष्ट रखा।

बालाकोट हमले के द्वारा उसने राष्ट्र की जनता को सुरक्षा का एक वचन सा दे दिया है।

पाँचवें, भाजपा ने संपूर्ण भारत में अपने विस्तार की नीति के चलते ओड़िशा, पूर्वोत्तर बंगाल आदि राज्यों में विकासवादी योजनाओं का प्रसार करके इन्हें देश की मुख्यधारा में लाने का काम किया है। अभी तक बंगाल को तृणमूल काँग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया कि नई राजनीति के इस युग में, कोई भी राज्य गढ़ की प्रतिरक्षा नहीं रख सकता।

‘नई राजनीति’ से उम्मीद की जा सकती है कि यह सबका साथ, सबका विकास की आत्मा के प्रति सच्ची उतरेगी। जगद्गुरु ने सभ्य संवाद की महत्ता के बारे में कहा था, जिसमें अपने विरोधी को भी प्रजातांत्रिक सम्मान के साथ देखा जाता है। चाणक्य, जो एक महान् कूटनीतिज्ञ थे, विरोधी विचारों का स्वागत करते थे, परन्तु वे एक उज्जवल शासनकला के प्रबल पक्षधर थे। वे यह जानते थे कि किसी राष्ट्र की शक्ति सामाजिक सामंजस्य में निहित होती है। नए राजनीतिक युग में भी इन दो महान् विचारकों के आदर्शों के महत्व को कायम रखने की आशा की जा सकती है।

सौजन्य से – AFEIAS

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित पवन के वर्मा के लेख पर आधारित। 25 मई, 2019

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